Skip to main content

Engineer's Day 2023: सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया - क्या आप जानते है कौन थे सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया


सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया भारत के पहले सबसे बड़े इंजीनियर और महान अभियंता एवं राजनायिक थे।

इन्हें सन् 1955 में भारत के सबसे बड़ी उपाधि भारत रत्न से नवाजा गया था। विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को हुआ था। उनका जन्मदिन के दिन ही भारत में इंजीनियर-डे के रूप में मनाया जाता है।

कौन है – सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया 

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैयाका जन्म मैसूर के 16 जिले के चक्का Badlapurका रूप में हुआ था। वे तेलुगु परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री और माता का नाम वेंकाचम्मा था। इनके पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरय्या ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने जन्म स्थान पर ही पूरी की, लेकिन उसके आगे की शिक्षा के लिए वह बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज गए। लेकिन यहां उनके पास पैसों का अभाव था, तो उन्हें ट्यूशन करना पड़ा और ट्यूशन पढ़ाते हुए अपनी शिक्षा पूरी की।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैयाने 1881 में बीए की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिसके बाद मैसूर सरकार ने उनकी आगे की पढ़ाई का जिम्मा उठाया और उनकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उनकी मदद की। जिसके बाद उन्होंने पुना के साइंस कॉलेज से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। यहां भी उन्होंने प्रथम स्थान के साथ अपनी इंजिीनियरिंग की परिक्षा पास की। इस उपलब्धि के चलते सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर का पद दिया।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने इन बड़े बांधों का किया था निर्माण

भारत की आजादी से पूर्व कृष्ण सागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्कस, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्ट्री, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत कई ऐसी महान उपलब्धियां सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या के कड़े प्रयासों का नतीजा रही। इसलिए इन्हें “कर्नाटक का भागीरथ भी कहा जाता है जब वे केवल 32 साल के थे, तब उन्होंने सिंधु नदी के शुक्र कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया, जो सभी इंजीनियरों को बेहद पसंद आया था। सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए उनके इस प्लान के तहत एक समिति बनाई थी। इसके लिए सर मोक्षगुंडम ने एक नए ब्लॉक सिस्टम का भी गठन किया। इसके बाद उन्होंने बांध निर्माण के दौरान स्टील के दरवाजे बनाए, जोकि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करते थे। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने खुले तौर पक की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या ने मूसा और ईशा नाम की दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किया था। इसके बाद उन्हें मैसूर के चीफ इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया गया।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की याद में मनाया जाता है इंजीनियर्स-डे

भारत में 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। बात दे की इसी दिन देश की सबसे बड़े इंजीनियर और जानकार रहे सर मोक्षगुंडम का जन्म हुआ था। और इनकी याद में ही पूरे भारत वर्ष में इस दिन इंजीनियर्स डे मनाया जाता है।

बेहद मशहूर है सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का यह किस्सा

एक समय की बात है एक सांवली सी सूरत वाला व्यक्ति अंग्रेजों के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहा था। ट्रेन में बैठे सभी दूसरे यात्री उसे देखकर उसका मजाक उड़ा रहे थे, कि तभी एकाएक वह उठा और उसने ट्रेन की चेन खींच कर ट्रेन को रोक दिया। वहां बैठे सभी यात्री अब उसे अपशब्द सुनाने लगे। इतने में ट्रेन कर्मचारी आया और उसने सवाल किया कि “यह ट्रेन किस ने रोकी”? इस बात पर उस व्यक्ति ने खड़े होकर कहा कि ट्रेन मैंने रोकी है। ट्रेन कर्मचारी ने पूछा कि आपने यह ट्रेन क्यों रोकी? उस व्यक्ति ने कहा कि दरअसल यहां से करीब 1 किलोमीटर दूर ट्रेन की पटरी टूटी हुई है। उस व्यक्ति की यह बात सुनकर ट्रेन कर्मचारी अपनी एक पूरी टीम के साथ ट्रेन की पटरी को देखने पहुंचे, जहां उन्होंने देखा कि सचमुच ट्रेन की पटरियां खुली हुई थी और उनके नट-बोल्ट निकले हुए थे। यह देख बेहद आश्चर्यचकित होकर ट्रेन कर्मचारी ने पूछा कि आप कौन हैं? इस बात का जवाब देते हुए उन्होंने कहा मेरा नाम है एम विश्वेश्वरय्या है और मैं पेशे से एक इंजीनियर हूं।

उस दौरान सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम पूरे विश्व में विख्यात था।  उनकी उपाधि हर किसी की नजरों में थी, इसलिए वहीं मौजूद सभी लोगों ने उनसे तुरंत माफी मांग ली। जिसपर बेहद विनम्रता के साथ उन्होंने कहा कि अरे मुझे तो ये भी नहीं याद की आप लोगों ने मुझे क्या कहा था।

Comments

Popular posts from this blog

किस जाति के होते हैं नाम के पीछे मुल्ला लगाने वाले मुसलमान? जवाब जानकर चौंक जाएंगे

नई दिल्ली।  भारत में कई धर्मों के लोग साथ मिलकर रहते हैं। यहां एक ही जगह पर कई धर्म-समुदाय के लोग रहकर एकता में अनेकता का उदहारण पेश करते हैं। हिंदू धर्म की तरह मुस्लिम धर्म में भी कई जातियां होती है। इसमें खान, सैयद, पठान, कुरैशी, शेख, अंसारी आदि शामिल हैं। क्या आपको पता है कि कई मुसलमान अपने नाम के पीछे मुल्ला लगाते हैं। आज हम आपको मुल्ला सरनेम और जाति के बारे में बताएंगे। कौन होते हैं मुल्ला मुल्ला शब्द फारसी से लिया गया है, जो कि अरबी के शब्द ‘मौला’ से ताल्लुक रखता है। मौला का अर्थ होता है मास्टर और गार्डियन। मुल्ला इस्लामी धार्मिक शिक्षा में योग्यता रखने वाले लोगों को कहते हैं। इसका उपयोग स्थानीय इस्लामी धर्मगुरु या मस्जिद के इमाम के लिए भी किया जाता है। साथ ही जो मुसलमान शरीअत का आलिम होता है उसे भी आदर से मुल्ला कहा जाता है। कसाई में आते हैं ये लोग इस्लामी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए मुल्ला कोई आधिकारिक उपाधि नहीं है। कई मुसलमानों में ये पारिवारिक सरनेम भी है। जैसे हिंदुओं में धर्म के जानकार को पंडित कहते हैं और उनके घर वाले भी ये सरनेम लगाने लगते हैं...

“सर तन से जुदा,सर तन से जुदा” : मजहबी उन्मादियों का दुस्साहस, पुणे जिलाधिकारी ऑफिस पर किया संत रामगिरि की हत्या का ऐलान

नई दिल्ली ।  पुणे कलेक्टर के कार्यालय के बाहर एक बड़ी भीड़ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर माहौल को तनावपूर्ण बना दिया, जब वहां “अल्लाह हू अकबर” और “सर तन से जुदा” जैसे उग्र नारे लगाए गए। यह भीड़ हिंदू संत महंत रामगिरि महाराज की हत्या की मांग कर रही थी। इन नारों ने पूरे देश में चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। नारेबाजी के दौरान “नारा ए तकबीर, अल्लाहु अकबर” और “लब्बैक या रसूलिल्लाह” जैसे धार्मिक नारे भी लगाए गए, जो कुछ ही देर में ‘सर तन से जुदा’ जैसे खतरनाक और हिंसक नारों में तब्दील हो गए। इस तरह की नारेबाजी आमतौर पर पाकिस्तान में जिहादी तत्वों द्वारा सुनी जाती है, लेकिन इसे पुणे की सड़कों पर सुना जाना बेहद चौंकाने वाला है। ‘नारा ए तकदीर, अल्लाहु अकबर’ व ‘…रसूलिल्लाह’ बोलते बोलते ये जिहादियों की भीड़’सर तन से जुदा’ की अपनी संस्कृति पर कैसे उतर जाती है? ये नारे पुराने नहीं, पाकिस्तान में भी नहीं अपितु, अभी हाल ही में पुणे में लगे हैं। किंतु फिर भी कम्युजिहादी व सेक्युलर जमात में सन्नाटा पसरा है!!…  pic.twitter.com/etJ96jH5rK — विनोद बंसल Vinod Bansal (@vinod_bansal)...

भारत वापस आएगी नटराज की नौवीं सदी की दुर्लभ मूर्ति, 22 साल पहले राजस्थान से हुई थी चोरी

22 साल पहले भगवान शिव की जो दुर्लभ मूर्ति चुराकर लंदन पहुंचा दी गई थी, वो वापस भारत आ रही है। आज-कल में नटराज की यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को सौंप दी जाएगी। नौवीं शताब्दी में चार फीट की इस मूर्ति का निर्माण प्रतिहार शैली में किया गया था। राजस्थान के बाड़ौली स्थित घंटेश्वर मंदिर से फरवरी, 1998 में यह मूर्ति गायब हो गई थी। पांच साल बाद पता चला कि तस्करों ने मूर्ति को ब्रिटेन पहुंचा दिया है। भारतीय एजेंसियां तभी से इसकी तलाश में थी। लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने ब्रिटिश सरकार की मदद से 2005 में इसे एक निजी संग्रहकर्ता से स्वेच्छा से हासिल किया। तभी से यह मूर्ति लंदन में इंडिया हाउस की लॉबी की रौनक बढ़ा रही थी। भारत सरकार अपने सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में एक नई ऊर्जा के साथ जुटी गुई है। विदेश मंत्रालय के नेतृत्व में भारतीय एजेंसियां चोरी व तस्करी की गई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने में जुटी हैं। भारत से चोरी हुई ब्रह्मा व ब्रह्माणी की मूर्ति भी ब्रिटेन से ही 2017 में वापस लाई गई थी। लंदन पुलिस द्वारा बरामद 12वीं सदी की बुद्ध की एक दुर्लभ कांस्य प्रतिमा को ...