Skip to main content

Bihar: बिहार में स्थित है एशिया का सबसे बड़ा रेल कारखाना , पिछले 12 सालों में कई उपलब्धियां मिली है

Asia's largest rail factory is located in Bihar


Indian railway को भारत में यातायात के लिए लाइफ लाइन कहा जाता है. रेलवे पर यात्रा करना हर किसी के लिए आसान है. चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब हो हर कोई रेलवे से यात्रा करना चाहता है. रेलवे (railway) देश में नौकरियों के मामले में भी एक बड़ी नियोक्ता है. ऐसे में आज हम एक ऐसे रेल कारखाने के बारे में जानेंगे जिसके नाम कई रिकॉर्ड दर्ज है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार में एशिया का पहला रेल कारखाना (rail factory) स्थित है.
12 सालों में यह रेल कारखाना मालगाड़ी वैगन मरम्मत करने के मामले में अव्वल रहा

Rail रेल कारखाने के नाम पर कई रिकॉर्ड दर्ज हैं. बता दें कि इस रेल रेल कारखाने में सात हजार के करीब कर्मचारी काम करते हैं. बिहार का यह रेल कारखाना हाल में अपना 160 वां साल भी पूरा किया है. इस दौरान इस रेल कारखाने ने कई उतार चढ़ाव को देखा है लेकिन उसके बाद भी आज तक अनवरत कार्य कर रहा है. इस दौरान इसने कई किर्तिमान अपने नाम दर्ज भी किया है. पिछले 12 सालों में बिहार में यह रेल कारखाना मालगाड़ी वैगन (goods train wagon) मरम्मत करने के मामले में अव्वल रहा है.

तो अब और लंबा इंतजार नहीं करवाते हैं आपको बता देते हैं उस रेल कारखाना के बारे में जिसके बारे में हम ऊपर में जिक्र किये हैं यह रेल कारखाना है जमालपुर रेल कारखाना. इस रेल कारखाने को भारतीय रेल का रीढ़ कहा जाता है. यहां के तकनीशियनों की कुशल कारीगरी को देखकर देश के दूसरे रेल कारखाना के तकनीशियन तकनीकी रूप से दक्ष होने पहुंचने या हम कहें वे यहां आकर ट्रेनिंग लेते हैं.
175 टन का क्रेन बनाने की कवायद तेजी से चल रही है

आपको बता दें कि 8 फरवरी 1862 को जमालपुर रेल काराखाना (Jamalpur Rail Workshop) की स्थापना हुई थी. इस कारखाने की नीव अंग्रेजों द्वारा दी गई थी. अब इस कारखाने के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि इसको निर्माण इकाई का दर्जा दे दिया जाए. जमालपुर रेल कारखाने की अगर हम उपलब्धियों को देखें तो जर्मनी के बाद पहला 140 टन का क्रेन बनाया था. अब यहां 175 टन का क्रेन बनाने की कवायद तेजी से चल रही है. अभी जर्मनी और चीन में ही यह क्रेन बनाया जाता है.

निजी कंपनियों को क्रेन भी कारखाना उपलब्ध कराएगा. अभी तक यह तमगा देश के किसी दूसरे कारखाना को नहीं मिला है. महत्वपूर्म कारखाना में शामिल इस कारखाना को इतिहास गौरवशाली रहा है. बता दें कि इस खाने से बने जैक की डिमांड पूरे देश में सबसे ज्यादा है.

जमालपुर रेल कारखाना ने पिछले 12 सालों में कई उपलब्धियां अपने नाम किया है. पूर्व रेलवे की सभी तीनों कारखानों की तुलना में जमालपुर रेल कारखाना का प्रधर्शन सबसे बेहतर रहा है. इस कारखाना ने लगातार अपने पूराने सभी आंकड़ों तोड़ते हुए अपना एकअलग कीर्तिमान स्थापित किया है. कारखाना पुराना है तो जाहिर सी बात हैं इसके नाम कई रिकॉर्ड हैं तो कई दाग भी हैं ऐसे में इस कारखाने के नाम पर एक दाग भी लगा है. जिसमें मालगाड़ी बैगन निर्माण के लिए 34 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया जिसमें कारखाना के अधिकारियों और संवेदकों की मिली भगत से यह घोटाला किया गया था. बाद में इसमें जांच हुई और घोटालेवाज अधिकारियों और कर्मचारियों को सजा के रूप में नौकरी से बाहर कर दिया गया.

इस कारखाने से मुंगेर सहित जमालपुर और दूसरे जिले का प्यापार भी निर्भर है. जमालपुर के व्यापारी बताते हैं कि जमालपुर का व्यापार पूरी तरह से कारखाने पर आधारित है. इस कारखाने से ही जिले की अलग पहचान है. वहां के व्यापारियों का कहना है कि कारखाने में कर्मचारियों की संख्या बढ़ेगी तो व्यापार में और भी तरक्की आएगी. इन्हे भी जरूर पढ़ें

Shimla, Mandi, Kangra, Chamba,Agra Ahmedabad Ajmer Aligarh Allahabad Ambala Amethi Amritsar Araria Aurangabad Baliya Badaun Bareilly Bathinda Bhagalpur Bhiwani Bikaner Bulandshahr Buxar Chhapra Chhindwara Chittorgarh Darbhanga Delhi Dhanbad Etawah Faridabad Gandhinagar Ghaziabad दरभंगा, पटना, लखनऊ, अहमदाबाद, नागपुर, भोजपुर, भागलपुर, गोपालगंज, कानपुर, नालंदा, मधुबनी, अरवल, मुजफ्फरपुर, बक्सर, सारण, अररिया, जहानाबाद, दिल्ली, वाराणसी, मुंबई, नागपुर, मधुबनी, कोलकाता, #दरभंगा, #पटना, #लखनऊ, #अहमदाबाद, #नागपुर, #भोजपुर, #भागलपुर, #गोपालगंज, #कानपुर, #नालंदा, #मधुबनी, #अरवल, #मुजफ्फरपुर, #बक्सर, #सारण, #अररिया, #जहानाबाद, #दिल्ली, #वाराणसी, #मुंबई, #नागपुर, #मधुबनी, #कोलकाता,

Comments

Popular posts from this blog

किस जाति के होते हैं नाम के पीछे मुल्ला लगाने वाले मुसलमान? जवाब जानकर चौंक जाएंगे

नई दिल्ली।  भारत में कई धर्मों के लोग साथ मिलकर रहते हैं। यहां एक ही जगह पर कई धर्म-समुदाय के लोग रहकर एकता में अनेकता का उदहारण पेश करते हैं। हिंदू धर्म की तरह मुस्लिम धर्म में भी कई जातियां होती है। इसमें खान, सैयद, पठान, कुरैशी, शेख, अंसारी आदि शामिल हैं। क्या आपको पता है कि कई मुसलमान अपने नाम के पीछे मुल्ला लगाते हैं। आज हम आपको मुल्ला सरनेम और जाति के बारे में बताएंगे। कौन होते हैं मुल्ला मुल्ला शब्द फारसी से लिया गया है, जो कि अरबी के शब्द ‘मौला’ से ताल्लुक रखता है। मौला का अर्थ होता है मास्टर और गार्डियन। मुल्ला इस्लामी धार्मिक शिक्षा में योग्यता रखने वाले लोगों को कहते हैं। इसका उपयोग स्थानीय इस्लामी धर्मगुरु या मस्जिद के इमाम के लिए भी किया जाता है। साथ ही जो मुसलमान शरीअत का आलिम होता है उसे भी आदर से मुल्ला कहा जाता है। कसाई में आते हैं ये लोग इस्लामी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए मुल्ला कोई आधिकारिक उपाधि नहीं है। कई मुसलमानों में ये पारिवारिक सरनेम भी है। जैसे हिंदुओं में धर्म के जानकार को पंडित कहते हैं और उनके घर वाले भी ये सरनेम लगाने लगते हैं...

“सर तन से जुदा,सर तन से जुदा” : मजहबी उन्मादियों का दुस्साहस, पुणे जिलाधिकारी ऑफिस पर किया संत रामगिरि की हत्या का ऐलान

नई दिल्ली ।  पुणे कलेक्टर के कार्यालय के बाहर एक बड़ी भीड़ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर माहौल को तनावपूर्ण बना दिया, जब वहां “अल्लाह हू अकबर” और “सर तन से जुदा” जैसे उग्र नारे लगाए गए। यह भीड़ हिंदू संत महंत रामगिरि महाराज की हत्या की मांग कर रही थी। इन नारों ने पूरे देश में चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। नारेबाजी के दौरान “नारा ए तकबीर, अल्लाहु अकबर” और “लब्बैक या रसूलिल्लाह” जैसे धार्मिक नारे भी लगाए गए, जो कुछ ही देर में ‘सर तन से जुदा’ जैसे खतरनाक और हिंसक नारों में तब्दील हो गए। इस तरह की नारेबाजी आमतौर पर पाकिस्तान में जिहादी तत्वों द्वारा सुनी जाती है, लेकिन इसे पुणे की सड़कों पर सुना जाना बेहद चौंकाने वाला है। ‘नारा ए तकदीर, अल्लाहु अकबर’ व ‘…रसूलिल्लाह’ बोलते बोलते ये जिहादियों की भीड़’सर तन से जुदा’ की अपनी संस्कृति पर कैसे उतर जाती है? ये नारे पुराने नहीं, पाकिस्तान में भी नहीं अपितु, अभी हाल ही में पुणे में लगे हैं। किंतु फिर भी कम्युजिहादी व सेक्युलर जमात में सन्नाटा पसरा है!!…  pic.twitter.com/etJ96jH5rK — विनोद बंसल Vinod Bansal (@vinod_bansal)...

भारत वापस आएगी नटराज की नौवीं सदी की दुर्लभ मूर्ति, 22 साल पहले राजस्थान से हुई थी चोरी

22 साल पहले भगवान शिव की जो दुर्लभ मूर्ति चुराकर लंदन पहुंचा दी गई थी, वो वापस भारत आ रही है। आज-कल में नटराज की यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को सौंप दी जाएगी। नौवीं शताब्दी में चार फीट की इस मूर्ति का निर्माण प्रतिहार शैली में किया गया था। राजस्थान के बाड़ौली स्थित घंटेश्वर मंदिर से फरवरी, 1998 में यह मूर्ति गायब हो गई थी। पांच साल बाद पता चला कि तस्करों ने मूर्ति को ब्रिटेन पहुंचा दिया है। भारतीय एजेंसियां तभी से इसकी तलाश में थी। लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने ब्रिटिश सरकार की मदद से 2005 में इसे एक निजी संग्रहकर्ता से स्वेच्छा से हासिल किया। तभी से यह मूर्ति लंदन में इंडिया हाउस की लॉबी की रौनक बढ़ा रही थी। भारत सरकार अपने सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में एक नई ऊर्जा के साथ जुटी गुई है। विदेश मंत्रालय के नेतृत्व में भारतीय एजेंसियां चोरी व तस्करी की गई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने में जुटी हैं। भारत से चोरी हुई ब्रह्मा व ब्रह्माणी की मूर्ति भी ब्रिटेन से ही 2017 में वापस लाई गई थी। लंदन पुलिस द्वारा बरामद 12वीं सदी की बुद्ध की एक दुर्लभ कांस्य प्रतिमा को ...