Skip to main content

कद्दावर नेतृत्व के अभाव में कमजोर पड़ा किसान आंदोलन, हिंसा पड़ी भारी



गणतंत्र दिवस पर हिंसा ने किसान आंदोलन की जमीन कमजोर कर दी है। सरकार को इसी बहाने आंदोलन खत्म कराने का बड़ा बहाना हाथ लग गया है। आंदोलन के प्रति सहानुभूति कम होने के बावजूद सरकार बहुत संभल कर आगे बढ़ रही है। सरकार की योजना चरणबद्ध तरीके से आंदोलन को खत्म कराने की है। इस रणनीति के तहत सरकार पहले उत्तर प्रदेश और इसके बाद हरियाणा में आंदोलनकारी किसानों को घर वापस भेजने की तैयारी में लगी है, जबकि किसान संगठन नए सिरे से लोगों की सहानुभूति हासिल करने में जुटे हैं

दरअसल, किसान आंदोलन को परिपक्व और कद्दावर नेतृत्व की कमी का खामियाजा भुगतना पड़ा है। आंदोलन में मुख्य रूप से शामिल चालीस किसान संगठनों में से किसी भी किसान नेता का कद बहुत बड़ा नहीं है। इनमें से एक भी किसान नेता ऐसे नहीं थे जो सर्व स्वीकार्य हों। इन किसान संगठनों का प्रभाव क्षेत्र एक क्षेत्र विशेष तक सीमित था। सर्वमान्य और कद्दावर चेहरे के अभाव के कारण किसान संगठन गणतंत्र दिवस पर आयोजित ट्रैक्टर रैली के संदर्भ में पूर्व तैयारी नहीं कर पाए। वह भी तब जब इन्हें पता था कि इसी रैली पर किसान आंदोलन का भविष्य टिका होगा। इसी नेतृत्व की कमी के कारण ट्रैक्टर रैली को किसान नेता अनुशासित नहीं रख पाए। खासतौर पर लालकिला के प्राचीर पर धर्मविशेष का झंडा लहराना इस आंदोलन पर बेहद भारी पड़ा है। इस घटना के बाद उपजे आक्रोश के कारण आंदोलन स्थल से बड़ी संख्या में किसान वापस लौट रहे हैं। इसी घटना ने किसान संगठनों को दबाव में ला दिया है।

खोई सहानुभूति फिर हासिल करने में जुटा किसान मोर्चा

अब आंदोलनरत किसान संगठनों का राष्ट्रीय किसान मोर्चा खोई सहानुभूति को फिर से हासिल करने के लिए परेशान है। आंदोलन स्थल से बड़ी संख्या में किसान वापस लौट रहे हैं। फिर से सहानुभूति हासिल करने के लिए आंदोलनरत किसान संगठन उपवास करने के अलावा एक फरवरी को प्रस्तावित संसद मार्च को वापस लेने की घोषणा की है। किसान संगठन अपनी ओर से आंदोलन स्थल पर किसानों की लामबंदी को पहले की तरह कायम रखने की कोशिशों में जुटे हैं।




धीरे-धीरे दबाव बनाने में जुटी सरकार

सरकार की रणनीति एकाएक आंदोलन को खत्म कराने की जगह आंदोलन खत्म करने के लिए धीरे-धीरे दबाव बनाने की है। इस रणनीति के तहत सरकार की योजना पहले यूपी-दिल्ली सीमा से किसानों को हटाने की है। हरियाणा से जुड़ी सीमा पर भी किसान संगठनों पर स्थानीय लोगों के विरोध के कारण दबाव की स्थिति है। सरकार हर हाल में संदेश देना चाहती है कि वह किसान विरोधी नहीं है। हालांकि सरकार का सारा जोर दिल्ली से लगी सीमा पर पहले जैसी भीड़ फिर से कायम होने देने की नहीं है। सरकार चाहती है कि हिंसा और स्थानीय लोगों के दबाव से किसान संगठनों का हौसला कम हो।

पंजाब-हरियाणा के संगठन भीड़ बनाने के लिए कर रहे कोशिश

अब तक तीन संगठनों ने आंदोलन से किनारा किया है। हालांकि, सच्चाई यह है कि अलग हुए तीनों संगठन भारतीय किसान यूनियन लोकशक्ति, राष्ट्रीय मजदूर किसान संगठन और भारतीय किसान संगठन भानू आंदोलन के लिए बनाए गए चालीस सदस्यीय राष्ट्रीय किसान मोर्चा का अंग नहीं रहे हैं। पंजाब और हरियाणा से जुड़े संगठन दिल्ली की सीमाओं पर पहले की तरह भीड़ बरकरार रखने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सरकार तत्काल आंदोलन के संदर्भ में आक्रामक रुख अपनाने के बदले एक-दो दिन और इंतजार करने के मूड में हैं।

Comments

Popular posts from this blog

किस जाति के होते हैं नाम के पीछे मुल्ला लगाने वाले मुसलमान? जवाब जानकर चौंक जाएंगे

नई दिल्ली।  भारत में कई धर्मों के लोग साथ मिलकर रहते हैं। यहां एक ही जगह पर कई धर्म-समुदाय के लोग रहकर एकता में अनेकता का उदहारण पेश करते हैं। हिंदू धर्म की तरह मुस्लिम धर्म में भी कई जातियां होती है। इसमें खान, सैयद, पठान, कुरैशी, शेख, अंसारी आदि शामिल हैं। क्या आपको पता है कि कई मुसलमान अपने नाम के पीछे मुल्ला लगाते हैं। आज हम आपको मुल्ला सरनेम और जाति के बारे में बताएंगे। कौन होते हैं मुल्ला मुल्ला शब्द फारसी से लिया गया है, जो कि अरबी के शब्द ‘मौला’ से ताल्लुक रखता है। मौला का अर्थ होता है मास्टर और गार्डियन। मुल्ला इस्लामी धार्मिक शिक्षा में योग्यता रखने वाले लोगों को कहते हैं। इसका उपयोग स्थानीय इस्लामी धर्मगुरु या मस्जिद के इमाम के लिए भी किया जाता है। साथ ही जो मुसलमान शरीअत का आलिम होता है उसे भी आदर से मुल्ला कहा जाता है। कसाई में आते हैं ये लोग इस्लामी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए मुल्ला कोई आधिकारिक उपाधि नहीं है। कई मुसलमानों में ये पारिवारिक सरनेम भी है। जैसे हिंदुओं में धर्म के जानकार को पंडित कहते हैं और उनके घर वाले भी ये सरनेम लगाने लगते हैं...

“सर तन से जुदा,सर तन से जुदा” : मजहबी उन्मादियों का दुस्साहस, पुणे जिलाधिकारी ऑफिस पर किया संत रामगिरि की हत्या का ऐलान

नई दिल्ली ।  पुणे कलेक्टर के कार्यालय के बाहर एक बड़ी भीड़ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर माहौल को तनावपूर्ण बना दिया, जब वहां “अल्लाह हू अकबर” और “सर तन से जुदा” जैसे उग्र नारे लगाए गए। यह भीड़ हिंदू संत महंत रामगिरि महाराज की हत्या की मांग कर रही थी। इन नारों ने पूरे देश में चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। नारेबाजी के दौरान “नारा ए तकबीर, अल्लाहु अकबर” और “लब्बैक या रसूलिल्लाह” जैसे धार्मिक नारे भी लगाए गए, जो कुछ ही देर में ‘सर तन से जुदा’ जैसे खतरनाक और हिंसक नारों में तब्दील हो गए। इस तरह की नारेबाजी आमतौर पर पाकिस्तान में जिहादी तत्वों द्वारा सुनी जाती है, लेकिन इसे पुणे की सड़कों पर सुना जाना बेहद चौंकाने वाला है। ‘नारा ए तकदीर, अल्लाहु अकबर’ व ‘…रसूलिल्लाह’ बोलते बोलते ये जिहादियों की भीड़’सर तन से जुदा’ की अपनी संस्कृति पर कैसे उतर जाती है? ये नारे पुराने नहीं, पाकिस्तान में भी नहीं अपितु, अभी हाल ही में पुणे में लगे हैं। किंतु फिर भी कम्युजिहादी व सेक्युलर जमात में सन्नाटा पसरा है!!…  pic.twitter.com/etJ96jH5rK — विनोद बंसल Vinod Bansal (@vinod_bansal)...

भारत वापस आएगी नटराज की नौवीं सदी की दुर्लभ मूर्ति, 22 साल पहले राजस्थान से हुई थी चोरी

22 साल पहले भगवान शिव की जो दुर्लभ मूर्ति चुराकर लंदन पहुंचा दी गई थी, वो वापस भारत आ रही है। आज-कल में नटराज की यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को सौंप दी जाएगी। नौवीं शताब्दी में चार फीट की इस मूर्ति का निर्माण प्रतिहार शैली में किया गया था। राजस्थान के बाड़ौली स्थित घंटेश्वर मंदिर से फरवरी, 1998 में यह मूर्ति गायब हो गई थी। पांच साल बाद पता चला कि तस्करों ने मूर्ति को ब्रिटेन पहुंचा दिया है। भारतीय एजेंसियां तभी से इसकी तलाश में थी। लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने ब्रिटिश सरकार की मदद से 2005 में इसे एक निजी संग्रहकर्ता से स्वेच्छा से हासिल किया। तभी से यह मूर्ति लंदन में इंडिया हाउस की लॉबी की रौनक बढ़ा रही थी। भारत सरकार अपने सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में एक नई ऊर्जा के साथ जुटी गुई है। विदेश मंत्रालय के नेतृत्व में भारतीय एजेंसियां चोरी व तस्करी की गई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने में जुटी हैं। भारत से चोरी हुई ब्रह्मा व ब्रह्माणी की मूर्ति भी ब्रिटेन से ही 2017 में वापस लाई गई थी। लंदन पुलिस द्वारा बरामद 12वीं सदी की बुद्ध की एक दुर्लभ कांस्य प्रतिमा को ...