Skip to main content

पहले मुर्गी आई या अंडा, इस सवाल का पक्का जवाब मिल गया -[.]-


दुनिया के सबसे पुराने और सिर घुमाने वाले सवालों में मुर्गी-अंडे वाला सवाल है. पहले कौन आया - मुर्गी या अंडा? अगर आप कहेंगे कि पहले मुर्गी आई, तो वो मुर्गी किसी अंडे से आई होगी. अगर आप कहेंगे अंडा, तो वो अंडा किसी मुर्गी ने ही तो दिया होगा. इस तरह ये जवाब पुरानी कैसेट की तरह फंस जाता है. और आदमी सिर धुनता रह जाता है.

मुर्गी-अंडे वाला ये सवाल यूनानी सभ्यता जितना पुराना है. दार्शनिक ऐरिस्टोटल (अरस्तु) के सामने भी ये सवाल आया था. ऐरिस्टोटल इस नतीजे पर पहुंचे कि ये एक इनफाइनाइट सीक्वेंस है, इसका कोई ट्रू ओरिजिन नहीं है. यानि ये सिलसिला अनंत है, इसका कोई सही मूल नहीं है. लेकिन हम साइंस के ज़रिए इसका जवाब पता करने की कोशिश कर सकते हैं?

मुर्गी एक पक्षी की प्रजाति है. ये ज़्यादा लंबा नहीं उड़ पाते, इसलिए इंसानों ने इन्हें दबोच रखा है. आजकल के पालतू मुर्गे एक जंगली पक्षी के वंशज हैं. इस पक्षी का नाम है जंगलफॉल. 2020 में हुई एक स्टडी के मुताबिक आज के मुर्गों का 71-79% DNA रेड जंगलफॉल से मिलता है. करीब 8000 साल पहले इन्हें पाला जाने लगा. और आज की पालतू मुर्गियों की कहानी शुरू हुई.

अंडा क्या होता है? अंडा बेसिकली कुछ परतों वाली एक संरचना होती है, जिसके अंदर भ्रूण रखा होता है. अंडे के अंदर वो सारी चीज़ें होती हैं, जिससे उस भ्रूण का विकास हो सके. अंडों का अस्तित्व बहुत पुराना है. जब इस दुनिया में मुर्गी जैसा दिखने वाला कोई जीव नहीं था, तब भी अंडे हुआ करते थे. डायनासोर अंडे देते थे. कई दूसरी प्रजाति के पक्षी अंडे देते थे. हमें ये कैसे पता? फॉसिल की मदद से.

फॉसिल यानी जीवाश्म. जानवर मर जाते हैं, लेकिन उनके अवशेष बचे रह जाते हैं. इन्हें फॉसिल कहते हैं. वैज्ञानिक इन फॉसिल से इनकी उम्र का अंदाज़ा लगा लेते हैं. डायनासोर के अंडे और भ्रूण के सबसे पुराने फॉसिल करीब 19 करोड़ साल पहले के हैं. और सबसे पुराने पक्षियों के जीवाश्म 15 करोड़ साल पुराने हैं. इसका मतलब अंडे तो मुर्गियों से करोड़ों साल पुराने हैं.

तो भैया प्रॉब्लम हो गई सॉल्व. अंडे मुर्गी से बहुत पहले आ चुके हैं. भले ही वो मुर्गी का अंडा न होकर दूसरे जीव-जंतुओं का अंडा हो. इस हिसाब से अंडा मु्र्गी से पहले आया.

आप कहेंगे, गुरू ये तो चीटिंग है. अपन तो मुर्गी वाले अंडे की बात कर रहे हैं. जमाने भर के अंडों से हमको क्या लेना? तो अपने सवाल को थोड़ा बदल लेते हैं.

इस सवाल का जवाब हमें इवॉल्यूशन की मदद से मिल सकता है. इवॉल्यूशन यानी क्रमिक विकास का सिद्धांत. उन्नीसवीं सदी में चार्ल्स डार्विन ने इवॉल्यूशन का कॉन्सेप्ट दिया. कई पीढ़ियों के दौरान हर जीव में बदलाव आते हैं. इसी तरह पृथ्वी पर जीवन का विकास हुआ है. जीवों में ये बदलाव जीन्स बदलने के कारण आते हैं.

हर जीव की बुनियाद उसके जीन्स हैं. यही वो कोड है, जो तय करता है कि कोई कैसा जीव बनेगा. उदाहरण के लिए अगर कोई जीव एक पकवान है, तो उसका DNA उसके बनने की रेसिपी है. आपका DNA आपके माता-पिता से आया है. हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को जीन्स ट्रांसफर करती है. जीन्स ट्रांसफर होने के दौरान कई बार बदलाव आ जाते हैं. इन बदलावों को म्यूटेशन कहते हैं. यही म्यूटेशन इवॉल्यूशन की बुनियाद है.

मुर्गियों के पूर्वज जंगलफॉल नाम के पक्षी हैं. जंगलफॉल में पीढ़ी दर पीढ़ी कई इवॉल्यूशन होने के बाद मुर्गी बनी होगी. पीढ़ियों में कई म्यूटेशन होते-होते किसी एक म्यूटेशन के बाद पहली मुर्गी पैदा हुई. ऐसा ऐग्ज़ैक्टली कब हुआ ये बता पाना बहुत मुश्किल है. इस पहली मुर्गी के मम्मी-पापा किसी और प्रजाति के जीव कहलाएंगे. उन्हें प्रोटो-चिकन कहते हैं.

जब दो प्रोटो-चिकन एक साथ आए, तो एक अंडा तैयार हुआ. इस अंडे के भ्रूण में कुछ म्यूटेशन हुए. ये भ्रूण बड़ा हुआ. और यही आगे चलकर पहली मुर्गी बना. तो पहली मुर्गी एक अंडे से ही बाहर निकलकर आई. इस हिसाब से भी अंडा पहले आया.

लेकिन मुर्गी पक्ष वाले अब भी बहस कर सकते हैं. उस अंडे की परिभाषा को लेकर. उस अंडे से पहली मुर्गी तो निकली लेकिन वो अंडा तो प्रोटो चिकन ने दिया था. तो क्या वो मुर्गी का अंडा कहलाएगा या प्रोटो चिकन का अंडा कहलाएगा? आप सर धुनिए.
आपको निचे दी गयी ये खबरें भी बहुत ही पसंद आएँगी।
हॉस्टल में रहने वाली लड़कियां करती है ये काम, जिनपर लोग नहीं करते है विश्वास
कश्मीर में सरेआम हुए थे बलात्कार, रातों-रात मार दिए गए थे सैकड़ों पंडित
यहां महिलाएं मुंह की बजाय गुप्तांग में दबाती है तंबाकू, वजह जानकर उड़ जायेंगे होश
ससुर को लग गई बहू से संबंध बनाने की लत, बेटे को तब लगी भनक जब…

Comments

Popular posts from this blog

किस जाति के होते हैं नाम के पीछे मुल्ला लगाने वाले मुसलमान? जवाब जानकर चौंक जाएंगे

नई दिल्ली।  भारत में कई धर्मों के लोग साथ मिलकर रहते हैं। यहां एक ही जगह पर कई धर्म-समुदाय के लोग रहकर एकता में अनेकता का उदहारण पेश करते हैं। हिंदू धर्म की तरह मुस्लिम धर्म में भी कई जातियां होती है। इसमें खान, सैयद, पठान, कुरैशी, शेख, अंसारी आदि शामिल हैं। क्या आपको पता है कि कई मुसलमान अपने नाम के पीछे मुल्ला लगाते हैं। आज हम आपको मुल्ला सरनेम और जाति के बारे में बताएंगे। कौन होते हैं मुल्ला मुल्ला शब्द फारसी से लिया गया है, जो कि अरबी के शब्द ‘मौला’ से ताल्लुक रखता है। मौला का अर्थ होता है मास्टर और गार्डियन। मुल्ला इस्लामी धार्मिक शिक्षा में योग्यता रखने वाले लोगों को कहते हैं। इसका उपयोग स्थानीय इस्लामी धर्मगुरु या मस्जिद के इमाम के लिए भी किया जाता है। साथ ही जो मुसलमान शरीअत का आलिम होता है उसे भी आदर से मुल्ला कहा जाता है। कसाई में आते हैं ये लोग इस्लामी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए मुल्ला कोई आधिकारिक उपाधि नहीं है। कई मुसलमानों में ये पारिवारिक सरनेम भी है। जैसे हिंदुओं में धर्म के जानकार को पंडित कहते हैं और उनके घर वाले भी ये सरनेम लगाने लगते हैं...

“सर तन से जुदा,सर तन से जुदा” : मजहबी उन्मादियों का दुस्साहस, पुणे जिलाधिकारी ऑफिस पर किया संत रामगिरि की हत्या का ऐलान

नई दिल्ली ।  पुणे कलेक्टर के कार्यालय के बाहर एक बड़ी भीड़ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर माहौल को तनावपूर्ण बना दिया, जब वहां “अल्लाह हू अकबर” और “सर तन से जुदा” जैसे उग्र नारे लगाए गए। यह भीड़ हिंदू संत महंत रामगिरि महाराज की हत्या की मांग कर रही थी। इन नारों ने पूरे देश में चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। नारेबाजी के दौरान “नारा ए तकबीर, अल्लाहु अकबर” और “लब्बैक या रसूलिल्लाह” जैसे धार्मिक नारे भी लगाए गए, जो कुछ ही देर में ‘सर तन से जुदा’ जैसे खतरनाक और हिंसक नारों में तब्दील हो गए। इस तरह की नारेबाजी आमतौर पर पाकिस्तान में जिहादी तत्वों द्वारा सुनी जाती है, लेकिन इसे पुणे की सड़कों पर सुना जाना बेहद चौंकाने वाला है। ‘नारा ए तकदीर, अल्लाहु अकबर’ व ‘…रसूलिल्लाह’ बोलते बोलते ये जिहादियों की भीड़’सर तन से जुदा’ की अपनी संस्कृति पर कैसे उतर जाती है? ये नारे पुराने नहीं, पाकिस्तान में भी नहीं अपितु, अभी हाल ही में पुणे में लगे हैं। किंतु फिर भी कम्युजिहादी व सेक्युलर जमात में सन्नाटा पसरा है!!…  pic.twitter.com/etJ96jH5rK — विनोद बंसल Vinod Bansal (@vinod_bansal)...

भारत वापस आएगी नटराज की नौवीं सदी की दुर्लभ मूर्ति, 22 साल पहले राजस्थान से हुई थी चोरी

22 साल पहले भगवान शिव की जो दुर्लभ मूर्ति चुराकर लंदन पहुंचा दी गई थी, वो वापस भारत आ रही है। आज-कल में नटराज की यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को सौंप दी जाएगी। नौवीं शताब्दी में चार फीट की इस मूर्ति का निर्माण प्रतिहार शैली में किया गया था। राजस्थान के बाड़ौली स्थित घंटेश्वर मंदिर से फरवरी, 1998 में यह मूर्ति गायब हो गई थी। पांच साल बाद पता चला कि तस्करों ने मूर्ति को ब्रिटेन पहुंचा दिया है। भारतीय एजेंसियां तभी से इसकी तलाश में थी। लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने ब्रिटिश सरकार की मदद से 2005 में इसे एक निजी संग्रहकर्ता से स्वेच्छा से हासिल किया। तभी से यह मूर्ति लंदन में इंडिया हाउस की लॉबी की रौनक बढ़ा रही थी। भारत सरकार अपने सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में एक नई ऊर्जा के साथ जुटी गुई है। विदेश मंत्रालय के नेतृत्व में भारतीय एजेंसियां चोरी व तस्करी की गई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने में जुटी हैं। भारत से चोरी हुई ब्रह्मा व ब्रह्माणी की मूर्ति भी ब्रिटेन से ही 2017 में वापस लाई गई थी। लंदन पुलिस द्वारा बरामद 12वीं सदी की बुद्ध की एक दुर्लभ कांस्य प्रतिमा को ...